जाने कब कुछ पगडंडियाँ...........
दरख़्त हो गयीं..........
और उनकी जड़ें मेरे जिस्म के उस कमरे में फैल गयीं...........
जिसे सदी की क़ब्रें जाने कब से...........
सिर्फ़ एक गुनाह के लिए पाक रखती हैं.........
और इश्क़ के लोबान की रूह भी.......
जहाँ कुफ्र होती है.........
धीरे धीरे उन जड़ों की काई उस कमरे से बाहर निकल.........
मेरे जिस्म के मकान तक फैल गयी..........
और हर आते जाते जिस्म की आँख.......
उसे खुरचने लगी.........
मेरे वजूद के हर एक हस्ताक्षर ने..........
उस कमरे की कुण्डी खोल...........
उसे चंद बल्बों की रोशनी दिखानी चाही...........
खुदाया............
वो कौन सी ताक़त थी ............
जो मेरी कलाई की चूड़ियों से ज़्यादा सुर्ख...........
मेरी सलवार के नारे की गाँठ से ज़्यादा पक्की थी...
जिसने उस दरवाज़े पे लगी..........
हर ठोकर को सह लिया............
और रात के सूरज की रोशनी में...........
उस काई को ........
एक चेहरा दे दिया............
अम्मा.........
एक दिन तू भी तो.........
ये गाँठ ऐसे ही बाँध बैठी थी..........
क्यूँ की तेरी "कोख जाई" में "ई" की एक मात्रा थी............
और ममता में "ई" की मात्रा लिखी जाती नहीं.......
शायद तेरे से विरासत में........
मैं ये गाँठ ले आई हूँ............
जिसके रहते.........
लोगों की इस "हराम" की औलाद को.........
मैं अपनी औलाद कह पाई हूँ.......
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