Monday, 29 December 2014

" यादों को बड़ी तक़लीफ़ होती है........"

गई रात......
शाम बहुत देर तक.......
चाँद के पन्ने पलटती रही.......
"वजह-बेवजह" जाने क्यूँ तुम बहुत........
"याद आते रहे"...........
बिखर गयीं है..........
तुम्हारी कुछ बातें.........
दहलीज़ पर नम होकर........
सूख जाएँगी खुद बा खुद बेखयालि की धूप में ये.......
"मत बुहारना इन्हे.........
यादों को बड़ी तक़लीफ़ होती है........"

Sunday, 16 December 2012

कोख


एक दिन चाँद की चादर ओढ़ ..............
कोख ने इश्क़ का एक घूँट प्रतिबंधित जल पी लिया.........
और बिना किसी शक्ल के..........
बिना किसी नाम के...........
अपना मकान रंग लिया..........
कोख भूल गयी शायद............
की उसे किसी ने अभी खरीदा नहीं था..........
और इश्क़ में आज तक कोई सौदा हुआ नहीं था.......
बस दिन बा दिन............
इश्क़ की शक्ल कोख में एक तस्वीर सी बनने लगी.........
और उम्मीद की स्याही............
फिर एक प्रतिबंधित गाथा लिखने लगी.........
क्यूँ चिनाब की कहानी आज फिर सच्ची लगने लगी........
और कोख खुद को हीर समझ..........
एक कच्चा घड़ा ले..........
फिर वक़्त की चिनाब तय करने लगी.........
हर तेज लहर को झेलती हुई........
हर ठंड को अपने वजूद की केंचुली सा............
उकेरती हुई...........
पार कर आई चिनाब वो..........
एक कच्चा घड़ा ले..........
और उसपे अपने इश्क़ की तस्वीर बना दी.........
अपनी हर साँस की गर्मी से..........
उसकी कच्ची माटी तपा दी.............
पोंछ आज जब अपने माथे का पसीना.......
वो हँसती हुई आँख से ............
निहारने बैठी उस तस्वीर को...........
उस कच्चे घड़े से एक उंगली उसकी तरफ उठी.........
एक सवाल की मिट्टी उसे सफेद बालों में भरी...........
" क्यूँ बनाई ये तस्वीर तूने मुझपर..........
और बनाई तो इस तस्वीर का नाम बता.............
या गुनाहगारों की फ़ेरहिस्त में ........
जा अपना नाम लिखा..........
क्यूँ की............
माँ कोख से नहीं........
बाप से हुआ करती है..........."
मगर शायद हीर आज भी नहीं समझी.............
चिनाब कच्चे घड़े से नहीं पार हुआ करती है........
किनारे पे भी ...............
कोख डूबा करती है................

"औलाद"


जाने कब कुछ पगडंडियाँ...........
दरख़्त हो गयीं..........
और उनकी जड़ें मेरे जिस्म के उस कमरे में फैल गयीं...........
जिसे सदी की क़ब्रें जाने कब से...........
सिर्फ़ एक गुनाह के लिए पाक रखती हैं.........
और इश्क़ के लोबान की रूह भी.......
जहाँ कुफ्र होती है.........
धीरे धीरे उन जड़ों की काई उस कमरे से बाहर निकल.........
मेरे जिस्म के मकान तक फैल गयी..........
और हर आते जाते जिस्म की आँख.......
उसे खुरचने लगी.........
मेरे वजूद के हर एक हस्ताक्षर ने..........
उस कमरे की कुण्डी खोल...........
उसे चंद बल्बों की रोशनी दिखानी चाही...........
खुदाया............
वो कौन सी ताक़त थी ............
जो मेरी कलाई की चूड़ियों से ज़्यादा सुर्ख...........
मेरी सलवार के नारे की गाँठ से ज़्यादा पक्की थी...
जिसने उस दरवाज़े पे लगी..........
हर ठोकर को सह लिया............
और रात के सूरज की रोशनी में...........
उस काई को ........
एक चेहरा दे दिया............
अम्मा.........
एक दिन तू भी तो.........
ये गाँठ ऐसे ही बाँध बैठी थी..........
क्यूँ की तेरी "कोख जाई" में "ई" की एक मात्रा थी............
और ममता में "ई" की मात्रा लिखी जाती नहीं.......
शायद तेरे से विरासत में........
मैं ये गाँठ ले आई हूँ............
जिसके रहते.........
लोगों की इस "हराम" की औलाद को.........
मैं अपनी औलाद कह पाई हूँ.......