गई रात......
शाम बहुत देर तक.......
चाँद के पन्ने पलटती रही.......
"वजह-बेवजह" जाने क्यूँ तुम बहुत........
"याद आते रहे"...........
बिखर गयीं है..........
तुम्हारी कुछ बातें.........
दहलीज़ पर नम होकर........
सूख जाएँगी खुद बा खुद बेखयालि की धूप में ये.......
"मत बुहारना इन्हे.........
यादों को बड़ी तक़लीफ़ होती है........"
शाम बहुत देर तक.......
चाँद के पन्ने पलटती रही.......
"वजह-बेवजह" जाने क्यूँ तुम बहुत........
"याद आते रहे"...........
बिखर गयीं है..........
तुम्हारी कुछ बातें.........
दहलीज़ पर नम होकर........
सूख जाएँगी खुद बा खुद बेखयालि की धूप में ये.......
"मत बुहारना इन्हे.........
यादों को बड़ी तक़लीफ़ होती है........"
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