Sunday, 16 December 2012

कोख


एक दिन चाँद की चादर ओढ़ ..............
कोख ने इश्क़ का एक घूँट प्रतिबंधित जल पी लिया.........
और बिना किसी शक्ल के..........
बिना किसी नाम के...........
अपना मकान रंग लिया..........
कोख भूल गयी शायद............
की उसे किसी ने अभी खरीदा नहीं था..........
और इश्क़ में आज तक कोई सौदा हुआ नहीं था.......
बस दिन बा दिन............
इश्क़ की शक्ल कोख में एक तस्वीर सी बनने लगी.........
और उम्मीद की स्याही............
फिर एक प्रतिबंधित गाथा लिखने लगी.........
क्यूँ चिनाब की कहानी आज फिर सच्ची लगने लगी........
और कोख खुद को हीर समझ..........
एक कच्चा घड़ा ले..........
फिर वक़्त की चिनाब तय करने लगी.........
हर तेज लहर को झेलती हुई........
हर ठंड को अपने वजूद की केंचुली सा............
उकेरती हुई...........
पार कर आई चिनाब वो..........
एक कच्चा घड़ा ले..........
और उसपे अपने इश्क़ की तस्वीर बना दी.........
अपनी हर साँस की गर्मी से..........
उसकी कच्ची माटी तपा दी.............
पोंछ आज जब अपने माथे का पसीना.......
वो हँसती हुई आँख से ............
निहारने बैठी उस तस्वीर को...........
उस कच्चे घड़े से एक उंगली उसकी तरफ उठी.........
एक सवाल की मिट्टी उसे सफेद बालों में भरी...........
" क्यूँ बनाई ये तस्वीर तूने मुझपर..........
और बनाई तो इस तस्वीर का नाम बता.............
या गुनाहगारों की फ़ेरहिस्त में ........
जा अपना नाम लिखा..........
क्यूँ की............
माँ कोख से नहीं........
बाप से हुआ करती है..........."
मगर शायद हीर आज भी नहीं समझी.............
चिनाब कच्चे घड़े से नहीं पार हुआ करती है........
किनारे पे भी ...............
कोख डूबा करती है................

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